जनपद प्रतापगढ़ के विकासखण्ड शिवगढ़ में भूमि उपयोग प्रतिरूप
निहारिका सोनकर1 डाॅ. प्रमोद कुमार तिवारी2
1शोध छात्रा (नेट) भूगोल विभाग, नागरिक पी.जी. कालेज, जंघई जौनपुर उत्तर प्रदेश
2प्राचार्य एवं विभागाध्यक्ष भूगोल विभाग, नागरिक पी.जी. कालेज, जंघई जौनपुर उत्तर प्रदेश
*Corresponding Author E-mail: sonkarniharika@gmail.com
सरांष
प्राकृतिक संसाधनों में भूमि अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं प्राथमिक संसाधन के रूप में है। तत्पश्चात अन्य संसाध्नों का उद्भव एवं विकास हो पाया है। मानव की आर्थिक प्रगति सामान्यतः भूमि उपयोगिता एवं सतत् विकास पर निर्भर है। विकास खण्ड शिवगढ़ अधिकता समतल मैदानी एवं उपजाऊ क्षेत्र होने के कारण भूमि की उपयोगिता का अत्यन्त महत्व है। यहाँ कृषि, पूँजी व मील अर्थात् उद्योगों का आभाव है। लोग कृषि पर ही निर्भर हैं। विकास खण्ड शिवगढ़ में निर्धनता, बेरोजगारी, यातायात समस्या, जनसंख्या वृद्धि, व्यवसायिक गतिशीलता का आभाव आवश्यक सेवाओं का क्रियान्वयन में आभाव जैसी समस्याओं पर प्रकाश डालना होगा जिसके लिये ग्रामीण अधिवास नियोजन, ग्रामीण आर्थिक नियोजन, ग्रामीण सामाजिक एवं ग्रामीण प्रशासनिक नियोजन द्वारा सतत् विकास सम्भव है। शोध क्षेत्र में संसाधनों का समुचित आकलन एवं इनका सदुपयोग जरूरी है।
मुख्यशब्द कृषि भूमि उपयोग प्राकृतिक संसाधन सतत् ग्रामीण विकास।
भूमिका
यह बात स्वाभाविक है कि निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या वाले देश में भूमि उपयोग में बदलाव एक सुविचरित प्रक्रिया द्वारा होना चाहिए। जिसके लिए अधिक सावधानी और सतर्कता (के साथ भूमि उपयोग का अध्ययन) बरतने की जरूरत है। मानव के भरण-पोषण के लिए भूमि उपयोग अध्ययन का विशेष महत्व है।
कृषि भूमि उपयोग प्रतिरूप में होने वाले परिवर्तन से आर्थिक, सामाजिक विकास का प्रतिरूप बदलता रहता है इस बदलते प्रतिरूप से अनेक प्रकार की सुविधाएँ बढ़ने के साथ-साथ विभिन्न प्रकार की समस्याएँ भी उत्पन्न होती रहती है। इन समस्याओं पर मानव विचार चिंतन करता है। मानव अपने भरण-पोषण के लिए भूमि पर भिन्न-भिन्न प्रकार की फसले उगाता है।
बारलोव (1954) के अनुसार भूमि संसाधन उपयोग, भूमि समस्या एवं योजना सम्बन्धी विवेचना की धुरी है। भूमि उपयोग को प्रभावित करने वाले कारकों में उन समस्त प्राकृतिक कारकों को समाहित किया जाता है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भूमि उपयोग को प्रवाहित करते हैं जैसे- जलवायु, धरातलीय मृदा, सूर्यताप, उच्चावच, वर्षा, जलीयधारा इत्यादि। ये सभी प्राकृतिक कारक भूमि उपयोग की सीमाओं को नियंत्रित करते हैं।
फोक्स (1956) के अनुसार निहित भूमि की विशेषताओं के आधार पर किसी क्षेत्र का वास्तविक प्रयोजन के साथ उपयोग हो, भूमि उपयोग कहा जाता है। विकास खण्ड शिवगढ़ में भूमि उपयोग को प्रभावित करने वाले कारक वहाँ कि कुल कृषि क्षेत्र पशुपालन एवं मत्स्य पालन सहकारित एवं वित्तीय संस्थाएँ सड़क परिवहन एवं शिक्षा क्षेत्र इत्यादि। किसी भी स्थान विशेष के सम्पूर्ण मानवीय गतिविधियों में से जब किसी एक तथ्य पर प्रकाश डाला जाता है या शोध कार्य किया जाता है तो सर्वप्रथम वहाँ के धरातलीय मिट्टी अर्थात् उस क्षेत्र की भूमि का अवलोकन और विश्लेषण किया जाता है क्योंकि मनुष्य सर्वप्रथम भूमि पर अपने जीवननिर्वाह व भरण-पोषण हेतु सतत् विकास का कदम रखता है।
उद्देश्य
1ण् प्रकृति व मानवीय संसाधन से सतत् विकास हेतु भूमि उपयोग।
2ण् अध्ययन क्षेत्र में भूमि उपयोग के वर्तमान प्रतिरूप का अध्ययन करना।
अध्ययन क्षेत्र
शोध पत्र अध्ययन क्षेत्र जनपद प्रतापगढ़ इलाहाबाद मण्डल के उत्तरी भाग में स्थित है। जनपद प्रतापगढ़ के कुल 17 विकासखण्ड में से एक विकास खण्ड शिवगढ़ भी है जो शोध अध्ययन क्षेत्र है। शिवगढ़ रानीगंज तहसील का ब्लाक है। यह विकासखण्ड प्रतापगढ़ के दक्षिण पूर्व भाग में स्थित है। जनपद मुख्यालय से विकासखण्ड शिवगढ़ मुख्यालय की दूरी 27 किमी. है। विकासखण्ड शिवगढ़ का भौगोलिक क्षेत्रफल 129.71 वर्ग किमी हे. है। जो जनपद प्रतापगढ़ के ग्रामीण क्षेत्र का 3.5 प्रतिशत है। विकासखण्ड शिवगढ़ की कुल जनसंख्या 142650 जिसमें 71002 पुरूष तथा 71648 स्त्री जनसंख्या है। जनसंख्या घनत्व 1227.00 प्रतिवर्ग किमी. है। साक्षरता 73.39 प्रतिशत है जबकि पुरूषों की साक्षरता 86.02 प्रतिशत तथा महिलाओं की साक्षरता 63.03 प्रतिशत है। विकासखण्ड शिवगढ़ की सीमा के अन्तर्गत एक मात्र सई नदी का बहाव क्षेत्र आता है। उपरोक्त स्थिति को ध्यान दिया जाये तो विकास क्षेत्र में ग्रामीण लोगों की आर्थिक स्थिति में व जीवन स्तर में सुधार एवं सतत् विकास सम्भव है।
आँकड़ा स्रोत तथा शोध विधि तंत्र:
प्रस्तुत शोध पत्र में द्वितीयक एवं तृतीयक स्रोतों से प्राप्त आँकड़ों का उचित प्रयोग किया गया है। विकास खण्ड शिवगढ़ का विश्लेषण करने हेतु आँकड़ों का संचयन विकास खण्ड सांख्यिकीय पत्रिका से किया गया है। इस अध्ययन में उपयुक्त मानचित्रों तथा आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण किया गया है। सामाजिक, आर्थिक तथ्यों को 2016 व 2019 की सांख्यिकी पत्रिका तथा राष्ट्रीय जनगणना 2011 से प्राप्त किया गया है।
अध्ययन क्षेत्र में भूमि उपयोग का प्रतिरूप
सा्रेत: विकासखण्ड सामाजिक पत्रिका से डाटा लेकर शोध छात्रा द्वारा बनाया गया।
भूमि उपयोग के प्रतिरूप का अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि शोध क्षेत्र में वर्ष 2014-15 से 2017-18 में कुल प्रतिवेदित क्षेत्रफल 6.87 प्रतिशत कमी देखने को मिली है जिसमें वन भूमि की स्थिति 2014-15 से 2017-18 समानता रही, कृषि योग्य बंजर भूमि में 2014-15 से 2017-18 की तुलना में 12.89 प्रतिशत कमी पाई गई। इसी प्रकार वर्तमान परती में 34.19 प्रतिशत की कमी व अन्य परती में 24.48 प्रतिशत की वृद्धि आयी। ऊसर एवं कृषि हेतु आयोग्य भूमि में 0.27 प्रतिशत कमी व कृषि के अतिरिक्त अन्य उपयोग की भूमि में 2014-15 से 2017-18 में 0.57 प्रतिशत वृद्धि हुई है। चारागाह 2014-15 से 2017-18 में समान स्थिति अंकित की गई है। वहीं झांड़ियों में 0.17 प्रतिशत कमी देखी गयी है तथा शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल की स्थिति समान है।
निष्कर्ष:
जनपद प्रतापगढ़ के विकासखण्ड शिवगढ़ में कृषि प्रधान क्षेत्र है। विकासखण्ड शिवगढ़ में अधिकतर लोगों की आर्थिक स्थिति संतोषजनक नहीं है। सरकार ने आर्थिक स्थिति में सुधार हेतु विभिन्न कार्यक्रम प्रारम्भ किया है। पंजायती राज व्यवस्था की पुनस्र्थापना के उद्देश्य से केन्द्र सरकार ने 1993 में 73वें संशोधन अधिनियम के द्वारा पंचायती राज व्यवस्था का संवैधानिक दर्जा प्रदान किया। इसके अन्तर्गत प्राथमिक स्तर ग्राम सभा की व्यवस्था की गई तथा त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं की व्यवस्था की गयी है। ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत विकास खण्ड स्तर पर खण्ड समिति जिला स्तर पर जिला परिषद्। अब आवश्यकता इस बात की है कि ग्रामीण स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग द्वारा आर्थिक मामले में आत्म निर्भरता प्राप्त की जाये।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
1 जनगणना रिपोर्ट 2011, भारत सरकार।
2 डाॅ. मौर्या डी.एस.।
3 डाॅ. तिवारी सी.आर., कृषि भूगोल प्रवालिका पब्लिकेशन।
4 कुरूक्षेत्र एवं योजना मासिक पत्रिका, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली।
5 जिला सांख्यिकी पत्रिका जनपद प्रतापगढ़ (2019) तथा सांख्यिकी पत्रिका विकासखण्ड शिवगढ़।
6 जिला समाजयिकी समीक्षा जनपद प्रतापगढ़ (2019) तथा सामाजयिकी समीक्षा विकासखण्ड शिवगढ़ 2016 व 2019।
7 भूतल दिग्दर्शन, भौगोलिक विकास शोध संस्थान गोरखपुर।
8 डाॅ. सिंह बहादुर महेन्द्र, प्रादेशिक विकास नियोजन।
9 Chaurasiya, Maheep, (2020), Janpad Jaunpur me Bhumi Upyog Pratirup ka ek bhaugolik Adhyayan, Published research paper in IJRRSS, Volume-8, Issue-3
Received on 06.03.2021 Modified on 19.03.2021
Accepted on 25.03.2021 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences. 2021; 9(1):19-21.